- कानून के हंटर से थर्राया ‘सफेदपोश’ जालसाज; पुलिस की सख्ती के आगे ‘माननीय’ की ढाल भी पड़ी कमजोर!
काशीपुर (ऊधम सिंह नगर)। काशीपुर पुलिस के बढ़ते इकबाल और कानून के लंबे हाथों ने आखिरकार महीनों से पुलिस को छका रहे शातिर अभियुक्त अनूप अग्रवाल उर्फ ‘लाला’ के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया है। खुद को कानून से ऊपर समझने वाला यह ‘सफेदपोश’, जो पुलिस की गिरफ्त से लगातार फरार चल रहा था, आज खाकी के खौफ और न्यायालय की सख्त हिदायत के बाद मजबूरन थाने की चौखट पर नाक रगड़ने को मजबूर हुआ। 7 संगीन मुकदमों के इस ‘भगोड़े’ किरदार के खिलाफ काशीपुर पुलिस ने जिस तरह घेराबंदी की, उसने साफ कर दिया कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ‘अपराध मुक्त उत्तराखंड’ की नीति के आगे रसूखदारों की दाल अब नहीं गलने वाली। सीओ काशीपुर के नेतृत्व में विवेचकों की टीम ने इस अभियुक्त की ‘आलीशान’ छवि की परतें उधेड़ते हुए जिस सख़्ती से पूछताछ की, उसने लाला के रसूख की पूरी हेकड़ी निकाल दी।
हैरान करने वाला दृश्य तब सामने आया जब गदरपुर विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री अरविंद पांडे, जो अक्सर सार्वजनिक मंचों से अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करते रहते हैं, एक 7 मुकदमों के ‘वॉन्टेड’ अपराधी के बगल में ढाल बनकर खड़े नजर आए। जो विधायक भ्रष्टाचार और नैतिकता की बातें करते नहीं थकते, आज वही एक ऐसे शख्स को “भाजपा कार्यकर्ता” और “सम्मानित व्यापारी” का चरित्र प्रमाणपत्र बांट रहे थे, जिस पर धोखाधड़ी (420) और जान से मारने की धमकी (506) जैसे गंभीर आरोप दर्ज हैं। सवाल यह उठता है कि क्या एक जनप्रतिनिधि का दायित्व कानून का साथ देना है या उन लोगों की पैरवी करना, जो महीनों से पुलिस को चकमा दे रहे थे? विधायक का यह कदम सीधे तौर पर खाकी के मनोबल पर चोट करने की एक नाकाम कोशिश जान पड़ती है।
पुलिस के आधिकारिक सूत्रों ने साफ कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक रसूख या ‘माननीय’ की मौजूदगी का जांच पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ेगा। अनूप लाला के बयानों का मिलान तकनीकी साक्ष्यों से किया जा रहा है और कुर्की की आहट ने इस ‘भगोड़े’ को यह अहसास करा दिया है कि सत्ता का संरक्षण जेल की सलाखों को रोक नहीं सकता। काशीपुर पुलिस की इस त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई ने जनता के बीच पुलिस के विश्वास को बुलंद किया है। अब देखना यह होगा कि अपनी ही सरकार पर सवाल उठाने वाले विधायक जी, इस ‘दागी’ संगति पर जनता को क्या जवाब देते हैं, क्योंकि कानून की किताब में ‘सफेदपोश’ और ‘साधारण अपराधी’ के लिए अलग-अलग न्याय नहीं होता।



